Lucent General Science in Hindi Part 1 [2020]

raviraj nag
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Lucent General Science in Hindi Part 1 [2020] Most Important General Knowledge

Lucent General Science 2020 coolgk
रसायन विज्ञानं Lucent General Science 2020

रसायन विज्ञानं शब्द की उत्पत्ति मिस्र के प्राचीन नाम कीमिया से हुई।

आधुनिक रसायन विज्ञानं का जन्मदाता लेवोसियर Lavoisier को कहा जाता है।

द्रव्य के विभिन्न प्रकार को पदार्थ कहते है। जैसे – दूध ,जल ,मोम।

संसार की सभी वस्तु द्रव्यो अर्थात पदार्थो से बनी है।

पदार्थो की भौतिक अवस्थाओं में परिवर्तन – एक ही पदार्थ तीनो भौतिक अवस्थाओं में रह सकता है।

पदार्थ की चौथी अवस्था प्लाज्मा एवं पांचवी अवस्था बोस आइंस्टीन कन्सेट है।

Lucent General Science in Hindi

वह पदार्थ जो एक ही प्रकार के परमाणुओं से मिलकर बना होता है तत्व कहलाता है।

तत्व 2 प्रकार के होते है – धातु और अधातु

धातु तत्व ऊष्मा और विधुत के सुचालक होते है। तथा यह ठोस अवस्था में आघातवर्धनीय Malleable और तन्य Ductile होते है।

तांबा ,एल्युमीनियम ,चाँदी ,सोना आदि धातु है।

अधातु तत्व विधुत और ऊष्मा के कुचालक होते है और यह भुरभुरे Brittle होते है। गंधक ,फॉस्फोरस ,ऑक्सीजेन ,ब्रोमीन आदि आधातु तत्व है।

Lucent General Science in Hindi

पृथ्वी पर पाए जाने वाले प्रमुख तत्व एवं उनका प्रतिशत

तत्व भू पटल में %
ऑक्सीजन 46.71 %
सिलिकॉन 27.69 %
एल्युमीनियम 8.07 %
लोहा 5.05 %
कैल्शियम 3.65 %
सोडियम 2.75 %
पोटासियम 2.58 %
मैग्निसियम 2.08 %
अन्य 2.42 %
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सामान्य मानव शरीर में तत्वों की औसत मात्रा

तत्व प्रतिशत
ऑक्सीजन 65.0 %
कार्बन 18.0 %
हाइड्रोजन 10.0 %
कैल्शियम 2.0 %
फॉस्फोरस 1.0 %
पोटेसियम 0.35 %
सल्फर 0.25 %
सोडियम 0.15 %
क्लोरीन 0.15 %
मैग्निसियम 0.05 %
लोहा 0.004 %
नाइट्रोजन 3.0 %
अन्य तत्व 0.046 %
Lucent General Science in Hindi 2020

वर्तमान समय में 112 तत्वों की खोज की जा चुकी है ,इनमे से 92 प्रकृति में पाए जाते है।

जबकि शेष तत्व वैज्ञानिक द्वारा प्रयोगशाला में कृत्रिम तरीको से संश्लेषित किये गए है।

योगिक – योगिक वह शुद्ध पदार्थ है जो दो या दो से अधिक तत्वों के निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोग से बनता है।उदहारण – जल एक योगिक है.

मिश्रण (Mixture)- मिश्रण वह अशुद्ध पदार्थ है ,जो दो या दो से अधिक शुद्ध पदार्थो के किसी भी अनुपात में बिना रासायनिक संयोग के मिलने से बनता है।

मिश्रण के प्रकार

1 समांग मिश्रण (Homogeneous Mixture )- वह मिश्रण जिसके प्रेत्यक भाग में उसके अवयवी पदार्थो का संघटन एवं गुण सामान रहता है समांग मिश्रण केहलता है।

जैसे – चीनी का जल में विलयन ,नमक का जल में विलयन

2 असमांग मिश्रण (Heterogeneous Mixture )- वह मिश्रण जिसके विभिन्न भागो में उसके अवयवी पदार्थो का संघटन एवं गुण एक से नहीं होते है ,असमांग मिश्रण कहलाते है।

जैसे – लोहा एवं गंधक का मिश्रण , बालू एवं नमक का मिश्रण आदि।

पदार्थ के अवयवी कण : अणु और परमाणु

अणु (Molecule )– किसी पदार्थ (तत्व या यौगिक ) का वह सूक्ष्तम कण जो स्वतंत्र अवस्था में रह सकता है ,परन्तु रासायनिक अभिक्रिया में भाग नहीं ले सकता अणु कहलाता है ।

अणुओं के बीच लगने वाले आकर्षण बल को अंतर आण्विक आकर्षण बल कहा जाता है। इसी बल के कारण पदार्थ के अणु ठोस एवं द्रव्य अवस्था में एक साथ जुड़े रहते है।

परन्तु पदार्थ को गैसीय अवस्था में बदल देने पर प्रेत्यक अणु एक दूसरे से अलग हो जाते है।

अणु दो प्रकार के होते है

तत्व के अणु एवं यौगिक के अणु।

जब एक ही तत्व के एक से अधिक परमाणु मिलकर उसके सूक्ष्तम स्वतंत्र कणो का निर्माण करते है तो ये कण तत्व के अणु कहलाते है।

उदहारण – हाइड्रोजन का अणु H2 हाइड्रोजन के दो परमाणुओं से मिलकर बना होता है।

जब एक से अधिक तत्वों के परमाणु मिलकर सूक्ष्तम स्वतत्र कणो का निर्माण करते है , तो ये कण योगिक के अणु कहलाते है।

उदहारण -मीथेन CH4 का प्रेत्यक अणु कार्बन का 1 परमाणु तथा हाइड्रोजन के 4 परमाणुओं से मिलकर बना होता है।

डाल्टन के अनुसार परमाणु अविभाज्य था ,परन्तु आधुनिक अविष्कारों से ज्ञात हो चूका है की परमाणु भी सूक्ष्म कणो से मिलकर बना है ,जिनमे इलेक्ट्रान ,प्रोटॉन ,एवं न्यूट्रॉन मुख्य है।

Lucent General Science (मिश्रणों का पृथक्करण)

मिश्रणो में घटको को विभिन्न विधियों द्वारा अलग -अलग किया जाता है।

1 क्रिस्टलन (Crystallisation )– इस विधि के द्वारा अकार्बनिक ठोसों में उपस्थित घटको का पृथक्करण एवं शुद्धिकरण किया जाता है।

2 आसवन (Distillation )– इस विधि द्वारा मुख्यतः द्रव्यों के मिश्रण को अलग किया जाता है ,जब दो द्रव्यों के क्वथनांकों में अंतर अधिक होता है।

3 ऊर्ध्वपातन (Sublimation ) कुछ ठोस पदार्थ ऐसे होते है जिन्हे गर्म किये जाने पर वे द्रव अवस्था में आने के बदले सीधे वाष्प में परिणत हो जाते है और वाष्प को ठंडा किये जाने पर पुनः ठोस अवस्था में हो जाते है। इस क्रिया को ऊर्ध्वपातन कहते है।

जैसे – कपूर ,नेप्थलीन ,अमोनियम क्लोराइड ,एन्थ्रासीन ,बेन्जोइक अम्ल आदि।

4 प्रभाजी आसवन (Fractional Distillation )- इस विधि के द्वारा मिश्रित द्रव्यों का पृथक्करण किया जाता है ,जिनके क्वथनांको में बहुत कम अंतर होता है।

5 भाप आसवन (Steam Distillation )- इस विधि द्वारा कार्बनिक पदार्थो का शुद्धिकरण किया जाता है ,जो जल में अघुलनशील परन्तु वास्प के साथ वाष्पशील होते है।

जैसे – एसीटोन ,मैथिल एलकोहल ,एसीटैल्डिहाइड आदि

परमाणु द्रव्यमान इकाई एवं मोल

परमाणु द्रव्यमान इकाई – कार्बन (जिसका परमाणु द्रव्यमान 12 होता है ) के एक परमाणु के द्रव्यमान के 12 वे भाग को परमाणु द्रव्यमान इकाई कहते है।

(Atomic Mass )परमाणु द्रव्यमान – किसी तत्व का परमाणु द्रव्यमान एक संख्या है ,जो यह बतलाती है की उस तत्व के एक परमाणु का द्रव्यमान कार्बन के एक परमाणु के द्रव्यमान के 12 वे भाग से कितना गुना भारी है।

सामान्य तत्व और उनके परमाणु द्रव्य

तत्व संकेत परमाणु संख्या परमाणु द्रव्यमान
हाइड्रोजन H11.008
हीलियम He24.003
लिथियम Li36.940
बेरिलियम Be49.013
बोरोन B510.82
कार्बन C612.011
नाइट्रोजन N714.006
ऑक्सीजन O815.999
फ्लोरिन F919.00
नियोन Ne1020.183
सोडियम Na1122.989
मैग्नीशियम Mg1224.32
एल्युमीनियम Al1326.97
सिलिकॉन Si1428.09
फोस्फोरोस P1530.98
सल्फर S1632.064
क्लोरीन Cl1735.453
आर्गन Ar1839.944
पौटेशियम K1939.09
कैल्शियम Ca2040.08
स्केंडियम Sc2144.95
टाइटेनियम Ti2247.867
वेनेडियम V2350.941
क्रोमियम Cr2451.996
मैंगनीज़ Mn2554.938
लोहा Fe2655.845
कोबाल्ट Co2758.933
निकिल Ni2858.693
तांबा Cu2963.546
जस्ता Zn3065.409
ब्रोमीन Br3579.916
चाँदी Ag47107.880
टिन Sn50118.70
सोना Au79196.9665
सीसा Pb82207.21
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मोल – मोल किसी पदार्थ के परमाणु ,अणु अथवा आयन की निश्चित संख्या को व्यक्त करता है , यह संख्या है 6.022 X 1023 जो मोल को प्रकट करती है। इसे एवोगैड्रो संख्या भी कहते है।

एवोगेड्रो संख्या – इसे N द्वारा सूचित किया जाता है ,यह किसी तत्व में एक ग्राम परमाणु में उपस्थित परमाणुओं की संख्या होती है।

N = 6.022 X 1023

Lucent General Science (परमाणु संरचना)

जॉन डाल्टन ने 1803 में परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया ,जिसके अनुसार परमाणु अविभाज्य होता है।

परन्तु 19 वि शदी में वैज्ञानिक ने प्रमाणित किया की परमाणु विभाज्य है और यह सूक्ष्म कणो से मिलकर बना होता है जिनमे इलेक्ट्रान ,प्रोटोन ,और न्यूट्रोन प्रमुख है।

परमाणु – यह किसी तत्व का वह छोटा से छोटा कण है ,जो किसी भी रासायनिक अभिक्रिया में भाग ले सकता है ,परन्तु स्वतत्र अवस्था में नहीं रह सकता।

अणु – किसी तत्व या यौगिक का वह छोटा से छोटा कण जो स्वंतंत्र अवस्था में रह सकता है अणु कहलाता है।

परमाणु के मौलिक कण

1 इलेक्ट्रान – इसकी खोज जे जे थॉमसन ने किया था ,इसका द्रव्यमान शून्य होता है तथा इसपर ऋण आवेश रहता है।

2 प्रोटोन – परमाणु के अंदर प्रोटोन एक ऐसा सूक्ष्म कण है ,जिसका सापेक्ष द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान के लगभग बराबर होता है ,

इसपर धन आवेश होता है।

प्रोटोन की खोज गोल्डस्टीन ने किया था।

3 न्यूट्रोन – परमाणु के अंदर न्यूट्रोन एक ऐसा सूक्ष्म कण है ,जिसका द्रव्यमान प्रोटोन के द्रव्यमान के लगभग बराबर होता है ,इसपर कोई आवेश नहीं होता है। यह उदासीन कण है।

न्यूट्रोन की खोज 1932 में चैडविक ने किया था।

रदरफोर्ड का नाभिकीय सिद्धांत

1911 में लार्ड रदरफोर्ड ने इसकी खोज किया था।

  • परमाणु में इलेक्ट्रान से घिरे केंद्र में प्रोटोन का एक छोटा सा किन्तु भारी नाभिक होता है।
  • इसके अंदर का अधिकांश भाग खाली रहता है।
  • यह गोलीय होता है।
  • परमाणु के नाभिक का आकार परमाणु के आकार की तुलना में अत्यंत छोटा होता है।

प्लैंक का क्वाण्टम सिद्धांत (Plank’s Quantum Theory )– 1901 में प्लैंक ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

किसी वस्तु से प्रकाश और ऊष्मा जैसी विकिरण ऊर्जा का उत्सर्जन या अवशोषण सतत नहीं होता ,बल्कि असतत रूप से छोटे छोटे पैकेट्स में होता है।

इन पैकेट्स को क्वाण्टम कहते है।

E = hV

जहाँ h = प्लैंक स्थिरांक ,V = विकिरण की कम्पनावृति ,E = क़्वांटम की ऊर्जा

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परमाणु संख्या (Atomic Number )– किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित इकाई धन आवेश की कुल संख्या या उस तत्व के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की कुल संख्या को उस तत्व की परमाणु संख्या कहते है।

इसे Z से सूचित किया जाता है।

  • परमाणु संख्या (Z ) = नाभिक में इकाई धन आवेश की कुल संख्या
  • = नाभिकीय आवेश
  • = नाभिक में प्रोटोन की कुल संख्या (p )
  • कक्षाओं में इलेक्ट्रान की कुल संख्या (e )
  • या Z = p = e

उदहारण – (a) हाइड्रोजन परमाणु के नाभिक में सिर्फ 1 प्रोटोन रहता है। अतः हाइड्रोजन की परमाणु संख्या 1 होती है।

(b) कार्बन के परमाणु के नाभिक में 6 प्रोटोन रहते है अतः कार्बन की परमाणु संख्या 6 होती है।

द्रव्यमान संख्या (Mass Number )– किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटोन और न्यूट्रोन की संख्याओं के योगफल को उस परमाणु की द्रव्यमान संख्या कहते है।

नाभिक में प्रोटोन और न्यूट्रोन के योग को न्यूक्लियोन कहा जाता है।

द्रव्यमान संख्या (A )= प्रोटॉनों की संख्या (p ) + न्युट्रोनो की संख्या (n ) = न्युक्लिनो की कुल संख्या

या A = n + p

किसी उदासीन परमाणु X के प्रतीक का निरूपण इस प्रकार से किया जाता है –

ZXA जहाँ A = द्रव्यमान संख्या और Z = परमाणु संख्या

बोर – ब्यूरी योजना

किसी तत्व के परमाणु की विभिन्न कक्षाओं में चक्कर लगाने वाले इलेक्ट्रोनो की व्यवस्था बतलाने के लिए बोर एवं ब्यूरी ने 1921 ई में अलग – अलग योजना प्रस्तुत की।

  1. किसी परमाणु की विभिन्न कक्षाओं में चक्कर लगाने वाले इलेक्ट्रोनो की अधिकतम संख्या 2n2 होती है , जहाँ n कक्षा संख्या है।
  2. परमाणु की सबसे बाहरी कक्षा में 8 से अधिक इलेक्ट्रान नहीं रह सकते है।
  3. किसी परमाणु की बाह्यतम कक्षा से पहले वाली कक्षा में 18 से अधिक इलेक्ट्रान नहीं रह सकते है।
  4. परमाणु की बाहरी कक्षा में 2 से अधिक और उससे पहले वाली कक्षा में 9 से अधिक इलेक्ट्रान तब तक उपस्थित नहीं रह सकते है ,जब तक अंतिम से तीसरी कक्षा में इलेक्ट्रान की संख्या नियम 1 के अनुसार पूर्ण न होजाये।

कक्षा या शेल (Shell ) – जब कोई इलेक्ट्रान किसी निश्चित कक्षा में परीभ्रमण करता है तो उसके साथ ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा रहती है। इसलिए इन कक्षाओं को ऊर्जा स्तर भी कहते है।

इन ऊर्जा स्तरों को K ,L, M, N, O, P, Q अक्षरों द्वारा सूचित किया जाता है।

नाभिक के सबसे निकट वाले शेल (n = 1 ) को K द्वारा , उसके बाद वाले शेल (n = 2 ) को L द्वारा सूचित किया जाता है।

नाभिक के सबसे निकट वाले शेल की ऊर्जा सबसे कम , तथा परमाणु के बाहरी शेल की ऊर्जा सबसे अधिक होती है।

उपकक्षा या सबशेल (Subshell)

परमाणु की प्रेत्यक कक्षा या शेल में कई उपकक्षाएँ या सबशेल होते है। इन उपकक्षाओं को s, p, d, f अक्षरों से निरूपित किया जाता है।

प्रत्येक उपकक्षाओ में इलेक्ट्रोनो की अधिकतम संख्या निश्चित होती है।

जो क्रमशः s, p, d, f के लिए क्रमशः 2, 6, 10, 14 हो सकती है।

  • K कक्षा (n = 1 ) में केवल s उपकक्षा
  • L कक्षा (n = 2 ) में s एवं p उपकक्षा
  • M कक्षा (n = 3 ) में s, p, एवं d उपकक्षा
  • N कक्षा (n = 4 ) में s, p, d, एवं f उपकक्षा उपस्थित रह सकती है।
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ऑफबाऊ सिद्धांत (Aufbau Principle)

सबशेलो में इलेक्ट्रोनो का क्रमिक प्रवेश ऑफबाऊ सिद्धांत कहलाता है।

इसकी उत्पत्ति Aufbau Prinzip से हुई है।

इसका अर्थ एक एक करके जोड़ना।

यह सिद्धांत निम्नलिखित नियमो पर आधारित है। –

  1. जिस सबशेल के लिए (n + L ) का मान न्यूनतम होता है ,इलेक्ट्रान पहले उसी में प्रवेश करता है।
  2. जब दो सबशेल के लिए (n + L ) का मान एक ही रहता है ,तब इलेक्ट्रान उस सबशेल में प्रवेश करता है ,जिसके लिए n का मान कम हो।

ऑफबाऊ सिद्धांत के आधार पर सबशेलो के ऊर्जा स्तर का क्रम –

1s < 2s < 2p < 3s <3p <4s <3d <4p <5s <4d <5p <6s <4f <5d < 6p < 7s < 5f

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इलेक्ट्रॉनिक विन्यास – कक्षाओं एवं उपकक्षाओ में इलेक्ट्रोनो के वितरण को परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास कहा जाता है।

उदहारण –

  • सोडियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Na (11) 2,8,1 = 1s2,2s2,2p6 , 3s1]
  • मेगनीसियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Mg (12) 2,8,2 = 1s2, 2s2, 2p6, 3s2]
  • कैल्सियम का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ca (20) 2,8,8,2 = 1s2, 2s2, 2p6, 3s2, 3p6, 4s2]

संयोजी इलेक्ट्रान – किसी भी परमाणु की बाहरी कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रान संयोजी इलेक्ट्रान कहलाते है।

कोर इलेक्ट्रान – किसी भी परमाणु के भीतरी कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रान को कोर इलेक्ट्रान कहते है।

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क़्वांटम संख्या (Quantum Numbers )

क़्वांटम संख्याए वे संख्या है ,जो किसी इलेक्ट्रान की स्थिति तथा उसकी ऊर्जा की जानकारी देता है।

किसी भी इलेक्ट्रान की स्थिति और उसकी ऊर्जा जानने के लिए चार तथ्यों का ज्ञान अनिवार्य है।

  1. इलेक्ट्रान का कोश
  2. कोश में वह किस सबकोश में है
  3. उस सबकोश में वह किस कक्षक में है
  4. उस कक्षक में उसका चक्रण किस प्रकार का है

क़्वांटम संख्या चार प्रकार की होती है।

  1. मुख्य क़्वांटम संख्या
  2. दिगंशी क़्वांटम संख्या
  3. चुंबकीय क़्वांटम संख्या
  4. चक्रण क़्वांटम संख्या

1 मुख्य क़्वांटम संख्या – नाभिक में इलेक्ट्रान की औसत ऊर्जा को सूचित करता है। इसे n द्वारा सूचित किया जाता है, जिसका मान 123 …….इत्यादि कोई भी पूर्णाक हो सकता है। किन्तु शून्य नहीं।

2 दिगंशी क़्वांटम संख्या – नाभिक के चारो और इलेक्ट्रान के कोणीय संवेग को प्रकट करता है ,इसे L से सूचित किया जाता है। n के किसी मान के लिए L का मान 0 से लेकर (n-L ) तक कुछ भी हो सकता है।

n = 1L =0
n = 2L = 0,1
n = 3L = 0,1,2
n = 4L = 0,1,2,3
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3 चुम्ब्कीय क़्वांटम संख्या – अंतराकाश में इलेक्ट्रान के कक्षा तल के अभिविन्यास की जानकारी देता है इसे m द्वारा सूचित किया जाता है इसका मान L के प्रेत्यक मान के लिए -1 से लेकर +1 तक सकता है। इसका मान शून्य भी होता है।

L = 0m = 0
L = 1m = -1, 0 , +1
L = 2m = -2, -1, 0, +1, +2
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m के पूर्ण मान की संख्या = 2L + 1

n के किसी मान के लिए m के कुल मानो की संख्या = n2

4 चक्रण क़्वांटम संख्या – परमाणु में इलेक्ट्रान के चक्रण को बताता है इसे s से सूचित किया जाता है ,इसके दो मान होते है। +1/2 तथा -1/2

पाउली का अपवर्जन सिद्धांत

एक ही परमाणु में उपस्थित दो इलेक्ट्रोनो की चारो क़्वांटम संख्या बराबर नहीं हो सकती। अतः यदि दो इलेक्ट्रोनो के n,l, और m के मान एक ही हो तो उनमे से एक के लिए s का मान +1/2 तथा दूसरे के लीये -1/2 होगा।

हुण्ड का नियम (Lucent General Science)

इस नियम को उच्चतम गुणन का नियम भी कहते है। इस नियम के अनुसार सामान ऊर्जा वाले ओर्बिटलो में पहले एक एक इलेक्ट्रान प्रवेश करता है। इसके बाद इसमें में से किसी में जब दूसरा इलेक्ट्रान प्रवेश करता है ,तब उस ऑर्बिटल के ये दोनों इलेक्ट्रान विपरीत चक्रण वाले होते है।

ऑर्बिटल – नाभिक का वह छेत्र जिसमे इलेक्ट्रान के पाए जाने की प्रायिकता सबसे अधिक होती है ऑर्बिटल कहलाता है।

समस्थानिक (Isotopes )– एक ही तत्व के वे परमाणु जिनकी परमाणु संख्या सामान , किन्तु द्रव्यमान संख्या भिन्न भिन्न होती है समस्थानिक कहलाते है।

उनके नाभिक में प्रोटोन की संख्या सामान होती है ,किन्तु उनके नाभिक में न्यूट्रॉन की संख्या भिन्न भिन्न होने के कारण उनकी द्रव्यमान संख्या भिन्न भिन्न होती है।

उदहारण – हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक होते है।

  • प्रोटियम = 1H1
  • ड्यूटेरियम = 1H2
  • ट्राइटियम = 1H3

कार्बन के दो समस्थानिक होते है। जिनकी परमाणु संख्या 6 तथा द्रव्यमान संख्या 12 और 14 होती है।

  • 6C12
  • 6C14

समस्थानिक एक ग्रीक भाषा का शब्द है ,जिसका एक सामान स्थान ,हाइड्रोजन एकमात्र ऐसा तत्व है जिसके सभी समस्थानिक के अलग -अलग नाम है।

पोलोनियम सर्वाधिक समस्थानिक वाला तत्व है।

हाइड्रोजन का समस्थानिक ट्राइटियम रेडियोसक्रियता का गुण प्रदर्शित करता है।

समभारिक (Isobars)

वे तत्व जिसकी द्रव्यमान संख्या बराबर किन्तु परमाणु संख्या भिन्न भिन्न होती है ,समभारिक कहलाते है।

इन तत्वों के नाभिको में प्रोटॉनों की संख्या भिन्न भिन्न होती है।

यह ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है समानभार।

उदहारण

  • आर्गन 18Ar40
  • पोटैसियम 19K40
  • कैल्सियम 20Ca40
  • नाइट्रोजन 7N14
  • कार्बन 6C14
  • सोडियम 11Na24 तथा मैग्निसियम 12Mg24

रेडियोसक्रियता तत्वों के बीटा कणो के उत्सर्जन से समभारिक बनते है।

समन्युट्रॉनिक (Isotones)- वे तत्व जिसकी परमाणु संख्या एवं द्रव्यमान संख्या दोनों भिन्न भिन्न हो ,किन्तु जिनके नाभिक में न्युट्रोन की संख्या सामान हो ,समन्युट्रॉनिक कहलाते है।

उदहारण –

  • फास्फोरस 15P31 तथा सल्फर 14S30 समन्युट्रॉनिक है ,क्यूंकि इनमे से प्रत्येक के नाभिक में 16 न्यूट्रॉन है।
  • वेनेडियम 23V51 तथा क्रोमियम 24Cr52 भी समन्युट्रॉनिक है ,क्यूंकि इन दोनों के नाभिक में न्यूट्रोनो की संख्या 28 है।

समइलेक्ट्रॉनिक (Isoelectronic)- वे आयन जिनमे इलेक्ट्रोनो की संख्या समान होती है ,समइलेक्ट्रॉनिक आयन कहलाते है।

उदहारण –

Na+ , Mg++ , Fआदि समइलेक्ट्रॉनिक आयन है ,क्यूंकि इनमे से प्रेत्यक में इलेक्ट्रोनो की संख्या 10 है।

( रेडियोसक्रियता ) Lucent General Science

प्रकृति में पाए जाने वाले वे तत्व जो स्वतः विखंडित होकर कुछ अदृश्य किरणों का उत्सर्जन करते है ,रेडियोसक्रीय तत्व कहलाते है और यह घटना रेडियोसक्रियता कहलाती है।

रेडियोसक्रीय तत्वों से निकलने वाली अदृश्य किरणे रेडियोसक्रीय किरणे कहलाती है।

रेडियोसक्रियता की खोज – 1896 ई में फ़्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बेकरेल ने सबसे पहले रेडियोसक्रियता का पता लगाया इन्होने पता लगाया की यूरेनियम से कुछ अदृश्य किरणे स्वतः उत्सर्जित होते है।

प्रारम्भ में इन किरणों को बेकरेल किरणे कहा गया।

1898 ई में मैडम क्यूरी तथा उनके पति पियरे क्यूरी ने बताया की यूरेनियम से बेकरेल किरणे निकलना एक परमाणु जनित क्रिया है।

मैडम क्यूरी और स्मिडट ने 1898 ई में बताया की थोरियम धातु में भी रेडियोसक्रियता पायी जाती है।

1902 में मेडम क्यूरी और पियरे क्यूरी ने पता लगाया की यूरेनियम के खनिज पिच ब्लेंड में यूरेनियम की अपेक्षा चार गुणी अधिक रेडियोसक्रियता उपलब्ध है।

इन्होने 1903 में पिच ब्लेंड से रेडियम नामक रेडियोसक्रीय तत्व की खोज की।

रेडियोसक्रियता के प्रकार

किसी तत्व के रेडियो सक्रीय परिवर्तन में परमाणु के नाभिक का विखंडन होता है इसका कारण यह है की रेडियोसक्रीय तत्वों के परमाणु अस्थायी होते है।

ऐसे परमाणु के नाभिक में न्युट्रोनो की संख्या अत्यधिक होती है।

रेडियोसक्रीयता दो प्रकार की होती है –

प्राकृतिक रेडियोसक्रियता तथा कृत्रिम रेडियोसक्रियता

ऐसे तत्वों के नाभिक स्वतः विखंडित होकर अन्य तत्वों के परमाणु में परिवर्तित होते रहते है ,इसमें रेडियोसक्रीय किरणों का उत्सर्जन होता है ,इसे प्राकृतिक रेडियोसक्रियता कहते है।

उदहारण –

यूरेनियम ,रेडियम ,थोरियम आदि।

रेडियोसक्रीय किरणे

रेडियोसक्रियता पदार्थो से निकलने वाली अदृश्य किरणों को रेडियोसक्रीय किरणे कहते है।

इन किरणों को रदरफोर्ड ने 1902 ई में चुंबकीय तथा विधुत छेत्र से प्रवाहित करके पाया की कुछ किरणे विधुत छेत्र के धन ध्रुव की और मुड़ जाती है। और कुछ ऋण ध्रुव की और मुड़ जाती है।

और कुछ किरणों पर चुम्बिकय और विधुत छेत्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और यह सीधे गमन करती हुई निकल जाती है।

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रदरफोर्ड के इन किरणों को अल्फा -किरण ,बीटा -किरण ,गामा -किरण कहते है।

रेडियोसक्रीय किरणों के गुण

अल्फा किरणों के गुण

  1. यह किरणे अति सूक्ष्म धन आवेशित कणो की बनी होती है। इस कारण विधुत छेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणे विधुत छेत्र के ऋण ध्रुव की और मुड़ जाती है।
  2. प्रयोग के आधार पर यह पाया गया है की अल्फा कण हीलियम आयन He++ है। इनकी मात्रा हाइड्रोजन परमाणु की मात्रा से चार गुनी अधिक होती है।
  3. यह कण अत्यंत तीव्र वेग से रेडियोसक्रीय तत्वों के नाभिक से बाहर निकलते है।
  4. इसका वेग प्रकाश के वेग का लगभग 1/10 भाग होता है।
  5. इन कणो का द्रव्यमान अधिक होने के कारण इनकी गतिज ऊर्जा अधिक होती है।
  6. इन किरणों को किसी गैस से होकर प्रवाहित करने पर ये आयनित कर देती है।
  7. अधिक द्रव्यमान होने के कारन इन किरणों की वेधन छमता कम होती है। 0.1 मिमी मोटी एल्युमीनियम की एक परत इन्हे रोक सकती है।
  8. यह किरणे फोटोग्राफ़िक प्लेट को प्रभावित करती है। तथा जिंक सल्फाइड या बेरियम प्लेटिनोसाइनाइड में स्फुरदीप्ति उत्पन्न करती है।

बीटा किरणों के गुण

  1. यह किरणे ऋण आवेशयुक्त अत्यंत सूक्ष्म कणो की बनी होतीहै। इस कारण विधुत छेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणे विधुत छेत्र के धन ध्रुव की और मुड़ जाती है।
  2. इन कणो के लिए आवेश और द्रव्यमान का अनुपात e/m केथोड किरणों में उपस्थित इलेक्ट्रोनो के सामान होता है।
  3. इन किरणों का द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान का 1/1840 होता है।
  4. इस कणो का वेग प्रकाश के वेग का लगभग 9/10 वा भाग होता है। अर्थात इनका वेग अल्फा कणो के वेग का 9 गुणा होता है।
  5. इनकी गतिज ऊर्जा अल्फा कणो से बहुत कम होती है ,क्यूंकि इनका द्रव्यमान कम होता है।
  6. कम गतिज ऊर्जा के कारण इनकी आयनन छमता अल्फा कणो की अपेक्षा कम होती है।
  7. उच्च वेग और कम द्रव्यमान होने के कारण इनकी भेदन छमता अल्फा कणो से 100 गुनी अधिक होती है। इनको रोकने के लिए 0.01 मीटर मोटी एल्युमीनियम की चादर आवश्यक होती है।

गामा किरणों के गुण

  1. ये किरणे उदासीन होती है इस कारण विधुत छेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणे विचलित नहीं होती है।
  2. यह किरणे अति लघु तरंगधैर्य वाली विधुत चुंबकीय तरंग है।
  3. ये किरणे कणो की नहीं बनी होती है। अतः गामा किरणे अद्रव्य प्रकृति वाली होती है।
  4. अति उच्च वेग से गतिशील होने के कारण गामा किरणों की वेधन छमता अल्फा और बीटा किरणों की तुलना में सबसे अधिक होती है।
  5. गतिज ऊर्जा का मान बहुत कम होने के कारण इन किरणों में गेसो को आयनित करने की छमता बहुत कम होती है।

रेडियोसक्रीय विखंडन (lucent General Science)

इन तत्वों के नाभिक से रेडियोसक्रीय तत्वों के स्वतः उत्सर्जन की प्रक्रिया को रेडियोसक्रीय विखंडन कहते है।

इस क्रिया में अल्फा ,बीटा गामा किरणों का उत्सर्जन होता है।

1913 ई में सोडी ,फोजोंस तथा रदरफोर्ड ने रेडियोसक्रीय विखंडन से सम्बंधित सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

  • रेडियोसक्रीय तत्वों के परमाणु अस्थायी होते है ,स्वतः विखंडित होकर नए तत्वों में परिवर्तित होते रहते है।
  • अल्फा कण और बीटा कण रेडियोसक्रीय तत्व के परमाणु के नाभिक से उत्पन्न होते है।

रेडियोसक्रीय परिवर्तन दो प्रकार के होते है –

  1. अल्फा परिवर्तन – अल्फा कण के निकलने से होने वाले परिवर्तन को अल्फा परिवर्तन कहते है।
  2. बीटा परिवर्तन – बीटा कण के निकलने से होने वाले परिवर्तन को बीटा परिवर्तन कहते है।

किसी परमाणु के नाभिक में से एक अल्फा कण के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु का द्रव्यमान मूल परमाणु के द्रव्यमान से 4 कम हो जाता है और परमाणु संख्या 2 कम हो जाती है।

88Ra226 ———86Rn224

किसी परमाणु के नाभिक में से एक बीटा कण के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु का द्रव्यमान वही रहता है ,जो मूल परमाणु का है ,लेकिन परमाणु संख्या में 1 की वृद्धि हो जाती है।

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